संजय राऊत-कार्यकारी संपादक
लोकतांत्रिक और संसदीय परंपराओं का गला घोंटने वाले ओम बिरला को मोदी ने दोबारा लोकसभा अध्यक्ष पद पर बिठाया। चंद्राबाबू नायडू और नीतीश कुमार को इतिहास माफ नहीं करेगा, ऐसा यह कृत्य है। राहुल गांधी विपक्षी दल के नेता बन गए हैं। यह मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
२०२४ का चुनाव खत्म हो गया, नई लोकसभा अस्तित्व में आ गई, बहुमत खो चुके मोदी प्रधानमंत्री बन गए, इसमें लोगों के लिए कोई नयापन नहीं रहा। राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता बन गए हैं और प्रधानमंत्री मोदी के सामने आंख से आंख मिलाकर वे सदन में बैठेंगे, इसका अभिमान देश को है। करीब १० साल तक मोदी और उनके लोगों ने राहुल गांधी को नकारा, उनकी सांसदी रद्द की और तत्काल उनका घर भी छीन लिया। मोदी-शाह के लोगों ने गांधी को अपमानित करने का कोई मौका छोड़ा नहीं था, लेकिन २६ जून की सुबह लोकसभा सभागृह का दृश्य जिन्होंने देखा, उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर तनाव और हताशा स्पष्ट दिखी होगी। लोकसभा अध्यक्ष पद पर ओम बिरला को चुना गया। परंपरानुसार, नवनियुक्त हुए लोकसभा अध्यक्ष को उनके आसन तक ले जाने की जिम्मेदारी संविधान ने प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता को सौंपी है। तदनुसार, मोदी और गांधी ने पहले हाथ मिलाया और दोनों ने बिरला को उनके आसन तक पहुंचाया। गांधी को नकारनेवालों को संसद में उनके साथ चलना होगा और उसके बाद प्रधानमंत्री और विपक्षी नेताओं को एक ही मंच पर शिष्टाचार का पालन करने के लिए आना होगा, तब प्रधानमंत्री की अवस्था विकट होगी। यही भारतीय संविधान और लोकतंत्र की ताकत है।
क्या बदल गया?
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भी मोदी के रवैये में कोई बदलाव नहीं दिख रहा है। ओम बिरला का चयन होने से शायद वे खुश हो गए हों, लेकिन लोकतंत्र की हत्या करनेवाले बिरला को ही पुन: लोकसभा अध्यक्ष पद पर लाया गया, ऐसा जनता को लगता है। ये वही ओम बिरला हैं, जिन्होंने पिछली लोकसभा में विपक्ष की आवाज दबा दी थी और एक साथ १०० से ज्यादा सांसदों को निलंबित कर दिया था। २६ जून को उन्हें चुना गया और उसी दिन कामकाज खत्म होते ही उन्होंने ‘आपातकाल’ के खिलाफ एक बयान प़ढ़कर सुनाया, जिसकी जरूरत नहीं थी। आपातकाल के दौरान लोकतंत्र और स्वतंत्रता का दमन किया गया। विरोधियों को जेल में डाल दिया गया। लोकसभा अध्यक्ष बिरला द्वारा आपातकाल ये लोकतंत्र पर लगा काला धब्बा है, ऐसा पढ़ते समय सदन में प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह मौजूद थे। पिछले दस वर्षों में उनका कामकाज आपातकाल से भी भयानक, निर्दयतापूर्ण रहा। राजनीतिक विरोधियों को झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल में डाला और प्रताड़ित किया गया। दस वर्षों में मानवाधिकारों का उल्लंघन जितना हुआ, उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ होगा। लोकसभा के अध्यक्ष पद पर आसीन बिरला ने लोकतांत्रिक संहार को समर्थन दिया और उसी बिरला ने लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में मदद की, ऐसा भाषण मोदी ने संसद में दिया।
मोदी बिल्कुल भी नहीं बदले हैं और बहुमत खोने के बाद भी उनके अंदर का तानाशाह जिंदा है। राहुल गांधी को संसद में उस तानाशाही के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी।
नीतीश और चंद्राबाबू की बदनामी
नीतीश कुमार और चंद्राबाबू नायडू की सबसे ज्यादा बदनामी इस काल में होनेवाली है। संविधान विरोधी और लोकतंत्र को न माननेवाली सरकार इन दोनों के समर्थन से मोदी चला रहे हैं। ऐसे में सरकार के हर अपराध की जिम्मेदारी इन दोनों नेताओं पर आएगी और एक तानाशाह सरकार को स्वार्थवश समर्थन देने का रिकॉर्ड भारत के इतिहास में दर्ज होगा। फिर समर्थन देने की कीमत भी ये दोनों नेता वसूल नहीं कर पाए। चंद्राबाबू की तेलुगू देशम को लोकसभा का अध्यक्ष पद नहीं मिला, जो वह चाहती थी और नीतीश कुमार को साधारण रेल मंत्रालय चाहिए था, वो भी नहीं मिला। तो फिर इन दोनों ने समर्थन क्यों दिया? क्या ये समर्थन दिल से है? २६ तारीख की दोपहर को संसद की नई वैंâटीन में दोनों पार्टियों के सांसदों की मुलाकात हुई। आंध्र और बिहार के सांसदों ने कहा, ‘‘हमारे सांसदों में भी नाराजगी है।” आंध्र के तेलुगू देशम के सांसदों का कहना है कि मोदी के साथ जाने से हमारे राज्य में जनता में रोष निर्माण होगा और आनेवाला समय मुश्किल भरा होगा। आंध्र की पहचान स्वाभिमानी भूमि के रूप में है। वह स्वाभिमान दिल्ली में कहीं भी नजर नहीं आया। पचास साल पहले के आपातकाल के नाम पर मोदी और शाह के लोग आज भी संसद में हंगामा करते हैं, लेकिन पिछले दस साल में मोदी ने तानाशाह की ही तरह व्यवहार किया है। बिहार में लोकनायक जयप्रकाश नारायण और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं ने आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाई थी, इनमें कर्पूरी ठाकुर भी थे, लेकिन तानाशाही तरीके से काम करनेवाले मोदी की सरकार में कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर जाकर बैठ गए। यह विसंगति नई लोकसभा में भी है। इंदिरा गांधी निडर और बहादुर थीं। उन्होंने देश के खिलाफ साजिश रचने वालों को सरेआम जेल में डाल दिया। आज भाजपा का विरोध करने पर मोदी-शाह के आदेश पर राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया गया। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल जेल में क्यों हैं? केजरीवाल और उनके दो मंत्रियों को बिना किसी सबूत या आधार के शराब घोटाले के आरोप में जेल में डाल दिया गया। पीएमएलए अदालत ने उन्हें जमानत दे दी और ईडी की मनमानी पर लगाम लगा दी। निचली अदालत का आदेश आने से पहले ही ईडी हाई कोर्ट पहुंच गई और जमानत पर रोक लगाने की मांग की और दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल को जेल से बाहर भी नहीं आने दिया। राजनीतिक हस्तक्षेप और दबाव के बिना यह संभव नहीं है। यह अल्पमत सरकार की तानाशाही है और यह मनमानी लोकतंत्र के पैरोकार माने जाने वाले नीतीश कुमार और चंद्राबाबू नायडू के समर्थन से चल रही है। संसद में एक मजबूत विपक्षी दल एकजुट हुआ है और राहुल गांधी विपक्षी दल के नेता के रूप में बैठे हैं, इसका उन्हें भान भी नहीं है। दिल्ली में नीतीश कुमार, चंद्राबाबू नायडू की प्रतिष्ठा पर आघात करनेवाला काम दिल्ली में चल रहा है और देश उन पर हंस रहा है।
व्रत स्वीकार नहीं हुआ
राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता बन गए हैं। मोदी के पुन: प्रधानमंत्री बनने की अपेक्षा गांधी का विपक्ष का नेता बनना महत्वपूर्ण है। अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर टपकने लगा और मोदी ने इसी राम मंदिर में बैठकर व्रत किया था। श्रीराम ने वह व्रत स्वीकार नहीं किया। पहली ही बारिश में अयोध्या में जलजमाव हुआ और राम मंदिर टपकने लगा। यह मोदी के लिए शुभ शकुन नहीं है। फिर संसद में कंधे पर बजरंग बली की गदा लिए राहुल गांधी खड़े हैं ही। इसका मतलब तानाशाही का लंकादहन निश्चित है!
नई संसद, नया राम मंदिर, चार सौ पार के आर-पार बांस ही घुस गया। ऐसा नहीं लगता कि मोदी अभी भी बदले हैं, लेकिन उनका चेहरा और बॉडी लैंग्वेज निराश, निस्तेज हो गया है। राहुल गांधी ने अभी तक कुछ भी नहीं किया। बहुत कुछ होनेवाला है, ऐसा लोगों को लगता है तो यह बेवजह नहीं है!