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वर्षों तक गलत रेडी रेकनर रेट का शिकार हुए लोग…अब जागा सिस्टम…पर सालों की चूक का कौन देगा हिसाब?

सामना संवाददाता / मुंबई

मुंबई जैसे तेजी से बदलते शहर में सरकार की रेडी रेकनर रेट प्रणाली एक लंबे समय तक जमीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुकी थी। कई इलाकों में जहां पहले झुग्गी बस्तियां या चॉल्स हुआ करती थीं, वहां अब गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो गर्इं। लेकिन अफसोस, सरकार के रिकॉर्ड अब भी पुराने आंकड़ों पर टिके रहे। इस लापरवाही का नतीजा ये हुआ कि छोटे फ्लैट्स या पुनर्विकसित स्लम प्रोजेक्ट्स में रहनेवाले लोगों को उन्हीं दरों पर स्टैंप ड्यूटी चुकानी पड़ी, जो करोड़ों की कीमत वाले हाईराइज फ्लैट्स पर लागू होती हैं। कुछ मामलों में तो स्टैंप ड्यूटी, मकान की असली कीमत से भी ज्यादा हो गई। दूसरी तरफ बिल्डर्स और डेवलपर्स ने पुराने आरआर रेट्स का फायदा उठाकर सरकार को टैक्स का नुकसान पहुंचाया। यह पूरा मामला दिखाता है कि प्रशासनिक मशीनरी में डाटा अपडेट की भारी कमी रही है। कोई भी बड़ा सर्वे या रियल टाइम मॉनिटरिंग नहीं की गई। सिटी सर्वे नंबर (सीटीएस) के आधार पर रेट तय किए जाते रहे, जबकि उस सीटीएस में बदलाव हो चुका था। कहीं झुग्गी थी, अब मल्टीस्टोर बिल्डिंग है। रिपोर्ट की मानें तो अब सरकार माइक्रो-जोनिंग और जीआईएस बेस्ड सिस्टम (भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित प्रणाली) की बात कर रही है। इसमें हर इलाके को उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अनुसार, अलग-अलग रेट तय करने की योजना है। यह कदम सराहनीय है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसे पहले नहीं लागू किया जा सकता था? वर्षों तक जनता इस गलत नीति का शिकार बनी रही, घर खरीदना महंगा हुआ, आयकर विभाग से नोटिस मिले और अब जब दबाव बढ़ा, तब जाकर यह सुधार सामने लाया गया।

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