दीपक तिवारी
विदिशा। समस्त धर्मों का, वेदों का, शास्त्रों का सार यही है कि जीवन में परिश्रम करके या जोड़-तोड़ करके भौतिक क्षेत्र में राजनीतिक क्षेत्र में या किसी भी क्षेत्र में कितनी भी उपलब्धियां हासिल कर लें लेकिन अंतिम समय सब बेकार लगने लगती हैं। लेकिन आध्यात्मिक क्षेत्र में जो उपलब्धि त्याग तपस्या के द्वारा मिलती है वह जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी अक्षुण्ण रहती है ऐसी ही उपलब्धि टीकमगढ़ जिले के अचार धाम में जन्मे मलूक पीठाधीश्वर देवाचार्य राजेंद्र दास जी महाराज के जीवन में आई है, जब उन्हें 15 सितंबर को रैवासा पीठ के उत्तराधिकारी के रूप में चादरपोशी की गई। हालांकि यह भी एक सत्य है कि महाराज जी इस उपलब्धि को उपलब्धि ना मानकर प्रभु कार्य मानते हैं और अपने आप को रैवासा पीठ का झाड़ूदार कहते हैं लेकिन क्षेत्र के लोगों और अनुयायियों के लिए यह उपलब्धि गौरव करने वाली है और महाराज जी के कार्यों को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
दरअसल राजस्थान के सीकर जिले में रामानंद संप्रदाय की सबसे बड़ी एवं प्रतिष्ठित रैवासा पीठ के पीठाधीश्वर राधावाचार्य 30 अगस्त को ब्रह्मलीन हो गए। 1517 में बना जानकी नाथ का सबसे पुराना मंदिर भी इसी पीठ में है। इस पीठ के संस्थापक अग्रदेवाचार्य को साक्षात सीता जी के दर्शन का जिक्र भी मिलता है। राघवाचार्य वेदांत विषय में गोल्ड मेडलिस्ट थे वे राजस्थान संस्कृत अकादमी के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने राजस्थान में वेद आश्रम की स्थापना भी की। राघवाचार्य 25 फरवरी 1984 को रैवासा पीठ के पीठाधिपति बने थे, इससे पहले 16 पीठाधीश्वर रैवासा के रह चुके थे देवाचार्य डा राजेंद्र दास जी 18 वें पीठाधीश्वर बने हैं।
रैवासा पीठ देश की सबसे प्रतिष्ठित पीठ है इसके बारे में कितना भी लिखा जाए कम ही है। यहां महाकाव्य रामचरितमानस के रचनाकार वह गोस्वामी तुलसीदास जी भी पदों की रचना कर चुके हैं। तुलसीदास जी के प्रसिद्ध पद जानकी नाथ सहाय करें तब कौन बिगार करें नर तेरो की, रचना यहीं पर लिखी थी। रेवासा पीठ के जानकीनाथ मंदिर में भगवान श्री राम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी की दिव्य भव्य एवं आकर्षक मूर्तियां हैं और यहां दिन रात पिछले करीब 36 सालों से रामधुनी चल रही है। पीठ के साधु संत व शिष्य 8 घंटे रामधुनी के लिए अपना समय बांधते हैं।
बहरहाल 15 सितंबर 2024 दिन रविवार को बुंदेलखंड का सूर्य रैवासा में चमका जब राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की मौजूदगी में देश भर के संतों महंतों ने रैवासा धाम की गादी पर बिठाकर उत्तराधिकारी के रूप में डा राजेंद्रदास देवाचार्य की चादरपोशी की और वे रैवासा धाम के 18 वें पीठाधीश्वर बनाए गये। पीठाधीश्वर डा राजेंद्र दास जी देवाचार्य ने गद्दी संभालते ही कहा कि मैं महाराज राघवाचार्य से कई बार मिला, लेकिन उन्होंने वसीयत के बारे में कभी बात नहीं की। राघवाचार्य महाराज मुझे हमेशा कहते थे कि अब मुझे रैवासा पीठ की कोई चिंता नहीं है। जब मैं उनसे पूछता था कि चिंता क्यों नहीं है तो भी राघवाचार्य महाराज मुझे कुछ नहीं बताते। यहां बताते चलें कि देवलोक गमन से तीन दिन पहले 27 अगस्त को राघवाचार्य महाराज ने राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाडी को बुलाकर अपना वसीयतनामा सौंपा। देवाचार्य पीठाधीश्वर डा राजेंद्र दास जी महाराज का कहना है कि यदि राघवाचार्य महाराज उन्हें यह जिम्मेदारी देने से पहले बताते तो मैं उनके पैर पकड़कर मना कर देता, लेकिन अब वह मुझे रैवासा पीठ की जिम्मेदारी सौंप कर गए हैं तो मैं निश्चित इस जिम्मेदारी को निभाऊंगा और रैवासा पीठ को आगे तक ले जाने के लिए काम करूंगा।
टीकमगढ़ जिले के आचारा धाम में जन्मे मलूक पीठ वंसीवट वृंदावन धाम के पीठाधीश्वर देवाचार्य डॉ राजेंद्र दास जी महाराज जाने-माने आचार्य वक्ता सनातन धर्म के पथ प्रदर्शक हैं। जिस तरह से डा राजेंद्र दास जी महाराज के नेतृत्व में मलूक पीठ सनातन धर्म का प्रचार प्रसार शास्त्र सेवा साधु सेवा एवं गौ सेवा का अभियान चलाए हुए है। जन जागृति लाई जा रही है उससे सभी साधु संत समाज को विश्वास है कि रैवासा पीठ के लिए योग्य पीठाधीश्वर मिल गए हैं और सनातन धर्म के लिए रैवासा पीठ एक मील का पत्थर साबित होगी।
कुल मिलाकर भले ही आज मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा है, लेकिन देवाचार्य पीठाधिपति डॉक्टर राजेंद्र दास जी महाराज का अलौकिक चिंतन और मनन करते हुए पूरा जीवन प्राणी मात्र के लिए समर्पित है। गौ सेवा की जो अलख जगा रहे हैं उस पर यदि अनुयायी एक प्रतिशत भी अमल कर लें तो मानव जीवन में खुशहाली अमन चैन शान्ति आ जाएगी। जिस तरह से भगवान कृष्ण ने गीता के माध्यम से किसी देश या किसी समाज के लिए नहीं बल्कि मानव कल्याण के लिए उपदेश देकर जीने की राह दिखाई है लगभग उसी तरह इस कलयुग में देवाचार्य डा राजेंद्र दास जी महाराज एक ऐसे चमकते दमकते संत हैं जो मानव कल्याण और जीव कल्याण के लिए न केवल पूरा जीवन समर्पित कर रहे हैं बल्कि आम जन की दुविधा और द्वंद्व को समाप्त करते हुए जीने की स्पष्ट राह बता रहे हैं।
बतौर प्रेमानंद जी महाराज इस समय हमारे सनातन धर्म में पूज्य श्री राजेंद्र दास जी महाराज धर्म ध्वजा हैं।अगर वाणी प्रमाण देखनी है एक भी शब्द की कोई मिस्टेक नहीं। शास्त्र का कहीं भी किसी भी तरह से विधान का एक भी शब्द का कहीं उलट फेर नहीं स्वयं में साधुता और शास्त्र सिद्धांत के वचन बिरला ही कोई ऐसा बोलने वाला होता है, बिरला ही जो कि स्वयं में साधु और साधु सेवी रहे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि सनातन धर्म के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के लिए आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों के शंकराचार्य जो कार्य कर रहे हैं। देवाचार्य डॉ राजेंद्र प्रसाद जी द्वारा वह कार्य पूरे देश में अपने प्रवचनों के माध्यम से अथक रूप से अकेले ही किया जा रहा है।