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लोकतांत्रिक अधिकारों पर मंडराया संकट! …नए विशेष जन सुरक्षा विधेयक को लेकर छिड़ी बहस

-१०,००० से अधिक आपत्तियां दर्ज

सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विशेष जन सुरक्षा विधेयक, २०२४ को लेकर व्यापक विरोध हो रहा है। रिपोर्ट की मानें तो इस विधेयक पर १ अप्रैल तक १०,००० से अधिक आपत्तियां और सुझाव दर्ज किए गए हैं। इसे सरकार ने शहरी नक्सलवाद और अराजक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए लाने की बात कही है, लेकिन नागरिक संगठनों ने इसे लोकतंत्र विरोधी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बताया है।
कई संगठनों का मानना है कि यह विधेयक सरकार को अत्यधिक अधिकार देता है, जिससे मानवाधिकार संगठनों और आलोचकों पर कार्रवाई की जा सकती है। इसमें ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जिनकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। इससे किसी भी व्यक्ति या संगठन को अवैध घोषित करने का रास्ता खुल सकता है।
विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर खासतौर पर आपत्ति जताई जा रही है। इसमें ‘अवैध गतिविधि’ को इतनी अस्पष्ट भाषा में परिभाषित किया गया है कि कोई भी आलोचनात्मक बयान या विरोध प्रदर्शन गैरकानूनी घोषित किया जा सकता है। इससे लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। इस विधेयक के खिलाफ विभिन्न संगठनों ने २२ अप्रैल को राज्यव्यापी प्रदर्शन और ३० जून को एक बड़े विरोध मार्च का एलान किया है। सरकार को सौंपे गए ज्ञापन में मांग की गई है कि विधेयक को वापस लिया जाए या इसमें आवश्यक संशोधन किए जाएं।
सरकार के पास पहले से मौजूद कानून
विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि देश में पहले से ही कई कानून मौजूद हैं, जो आपराधिक और उग्रवादी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त हैं। नए विधेयक की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इससे केवल असहमति को दबाने का खतरा पैदा होगा।
सरकार का पक्ष और आगे की प्रक्रिया
सरकार का कहना है कि इस विधेयक का मकसद राज्य की सुरक्षा को मजबूत करना है और लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों पर नियंत्रण पाना है। संयुक्त चयन समिति द्वारा इस पर विचार किया जा रहा है और जल्द ही कुछ संगठनों को सुनवाई के लिए बुलाया जा सकता है। समिति की सिफारिशें मानसून सत्र के अंत तक पेश किए जाने की संभावना है।

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