विजय कपूर
ब्रिटेन के आम चुनावों में १४ सालों बाद विपक्षी लेबर पार्टी को जबरदस्त बहुमत मिला है और सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी की बुरी तरह से हार हुई है। भारतीय मूल के ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के नेतृत्व में कंजर्वेटिव पार्टी चारोंखाने चित हो गई है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक ६५० सीटों में से ५९२ सीटों के नतीजे आ चुके थे, जिसमें लेबर पार्टी ३९२ सीटों पर जीत हासिल कर चुकी थी और अभी दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर आगे चल रही थी, जबकि प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के नेतृत्व में कंजर्वेटिव पार्टी ने अब तक १०१ सीटें जीत ली थीं और करीब ९ से १० सीटों पर अभी भी उनके उम्मीदवार फाइट कर रहे थे। ब्रिटेन में बहुमत की संख्या ३२६ है, इस तरह देखें तो ब्रिटेन में लेबर पार्टी ने शानदार बहुमत हासिल कर लिया है। लेबर और कंजर्वेटिव पार्टियों के अलावा इस चुनाव में अब तक ६१ सीटें लिबरल डेमोक्रेट्स, ७ सीटें सिन फिन पार्टी, ७ ही सीटें एसएनपी और २४ से ज्यादा सीटें अन्य के खाते में करीब ९० फीसदी से ज्यादा मतगणना हो जाने तक जा चुकी थीं।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने अपनी पार्टी की हार स्वीकार कर ली है और होनेवाले प्रधानमंत्री सर कीर स्टार्मर को जीत की बधाई दी है। ब्रिटेन में लेबर पार्टी की यह जीत अप्रत्याशित नहीं है। चुनाव के पहले से ही यह जीत करीब-करीब तय थी, क्योंकि विभिन्न मीडिया सर्वेक्षणों के जो निष्कर्ष सामने आ रहे थे, उससे पता चल रहा था कि कीर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी से करीब २० फीसदी आगे चल रही थी और ऐसे ही एग्जिट पोल के अनुमानों में भी आया था। एग्जिट पोल के मुताबिक, इंग्लैंड के निचले सदन की कुल ६५० सीटों में से ४१० सीटें लेबर पार्टी को मिल रही थीं और १३१ सीटों पर सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी सिमट रही थी, लेकिन लगता है कि प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की पार्टी को इतनी सीटें पाना भी मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कंजर्वेटिव पार्टी को सिर्फ ९२ सीटें ही मिली थीं और शेष बची करीब ६० सीटों में आधे से ज्यादा सीटें तो टोरियों को नहीं ही मिलनेवाली। लगता है कि एग्जिट पोल से भी कम सीटें सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी को मिलेंगी और यह एक रिकॉर्ड होगा। वैसे यह भी सही है कि १४ साल सत्ता में रहने के बाद और जिस तरह से सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर खींचतान मची हुई थी, उस सबको देखते हुए यह तो किसी को भी नहीं लग रहा था कि चौथी बार लगातार सत्ता में आकर कंजर्वेटिव पार्टी चमत्कार करेगी। बस यह देखना था कि यह जीत का अंतर कितना रहता है?
गौरतलब है कि ब्रिटेन में सरकार बनाने के लिए ३२६ सीटों की जरूरत होती है और वास्तविक नतीजों के आने के पहले ही कंजर्वेटिव पार्टी के अनेक सांसद और महत्वपूर्ण नेता यह मानने लगे थे कि इस बार उनकी पार्टी के लिए बहुमत तक पहुंचना संभव नहीं है। साल २०१९ में कंजर्वेटिव पार्टी से सांसद चुनी गर्इं डेहेना डेविडसन ने एग्जिट पोल्स के नतीजों के बाद कहा था कि १४ साल तक सत्ता में रहने के बाद भी अगर हमारी सरकार जीतती तो यह असाधारण होता। पर ऐसा शायद नहीं होने जा रहा, लेकिन उन्होंने सिर्फ इतनी सपाट बयानी से ही अपनी टिप्पणी का अंत नहीं किया, बल्कि इस बार चुनाव न लड़नेवाली डेहेना ने अपनी ही पार्टी पर यह तोहमत जड़ी कि उसे सत्ता में रहने की आदत हो गई है। इससे पता चलता है कि कंजर्वेटिव पार्टी सिर्फ लेबर पार्टी से या मतदाताओं से ही नहीं हारी, बल्कि अपने नेताओं और मंत्रियों से भी हारी है। पूर्व वैâबिनेट मंत्री सर रॉबर्ट बकलैंड जो कि इस बार के चुनाव में सबसे पहले हारने वालों में से थे, उन्होंने भी अपनी कंजर्वेटिव पार्टी की आलोचना की है। उनके मुताबिक, ‘हमारी पार्टी में बहुत से लोग व्यक्तिगत एजेंडे और पद की होड़ पर फोकस कर रहे हैं।’
देखा जाए तो यह अप्रत्याशित है।१४ सालों बाद अगर कंजर्वेटिव पार्टी हार गई है तो कोई आसमान नहीं टूट गया, लेकिन इस चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी के नेता जिस तरह चुनाव के पहले से ही खुलकर आपस में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे थे, उस कारण से यह आशंकित जीत अवश्यंभावी बन गई थी। सीनियर नेत्री डेहेना डेविडसन ने अपनी पार्टी पर चुनावों के दौरान ही आरोप लगाया था कि हमारी पार्टी को सत्ता में बने रहने की आदत हो गई है। इसी तरह की बातें कई दूसरे नेता भी कर रहे थे। कोई कह रहा था कि वक्त आ गया है कि कंजर्वेटिव सदस्य आईना देख लें वगैरह-वगैरह। सवाल है चुनाव के पहले ही आपस में सिर फुटव्वल वाले ये हालात आखिरकार टोरियों के बीच क्यों कर पैदा हुए? शायद इसलिए कि देश के पहले अश्वेत प्रधानमंत्री ऋषि सुनक को लेकर कंजर्वेटिव पार्टी आपस में काफी बंटी हुई थी। हालांकि, इन चुनाव में सभी पार्टियों ने कुल मिलाकर १०२ भारतवंशियों को चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया था, लेकिन यह बात भी है कि कंजर्वेटिव पार्टी में ऋषि सुनक को लेकर दो खेमे बन गये थे। एक खेमा कतई नहीं चाह रहा था कि ऋषि सुनक अपनी सरकार दोहराए, जबकि दूसरी तरफ लेबर पार्टी के लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने के बाद भी मतदाताओं का रुझान उन्हीं की तरफ था। यहां तक कि लेबर पार्टी के पूर्व लीडर जेरेमी कॉर्बिन भी चुनाव जीत गए, जबकि उन्हें लेबर पार्टी ने साल २०२० में महत्वपूर्ण विपक्षी लीडर के पद से हटा दिया था और कीर स्टार्मर के हाथों पार्टी की बागडोर सौंप दी थी।
लेकिन जिस तरह से जेरेमी कॉर्बिन लगातार अपनी पारंपरिक इस्लिंगटन सीट से जीत हासिल की है, उसे देखते हुए यह सोचा जा सकता है कि मतदाताओं का रुझान इस बार स्पष्ट रूप से लेबर पार्टी को ही जिताना था। मजे की बात यह है कि पूर्व लेबर पार्टी नेता जेरेमी कॉर्बिन अपनी पारंपरिक इस्लिंगटन सीट से ही जीत हासिल की है और अपने ही पूर्व पार्टी के उम्मीदवार को २४,००० से ज्यादा मतों से हराकर। इस बार जेरेमी कॉर्बिन चुनाव में बतौर स्वतंत्र उम्मीदवार उतरे थे। यही नहीं कंजर्वेटिव पार्टी की लिज ट्रस भी चुनाव हार गर्इं, जो कि साउथ वेस्ट नॉरफॉक से चुनाव लड़ रही थीं। गौरतलब है कि लिज ट्रस २०२२ में ४९ दिनों के लिए प्रधानमंत्री भी रही थीं। वह अपने प्रतिद्वंद्वी से सिर्फ ६०० वोटों से हार गर्इं, जबकि २०१९ में उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को २६,००० वोटों से हराया था। इससे पता चलता है कि इन चुनावों में कंजर्वेटिव पार्टी पूरी तरह से बिखरी और लगभग हारने के लिए पहले से तैयार बैठी थी। ब्रिटेन में इस बार के चुनाव की एक बड़ी और महत्वपूर्ण खूबी यह रही है कि सारे नतीजों के आने के पहले ही २४२ महिलाएं चुनाव जीत चुकी हैं, जबकि पिछली बार सिर्फ २२० महिलाएं ही चुनाव जीती थीं। मतलब साफ है कि ब्रितानी मतदाता आगामी सरकार को कहीं ज्यादा रचनात्मक और कहीं ज्यादा ईमानदारी से काम करना देखना चाहते हैं।
(लेखक सम-सामयिक विषयों के विश्लेषक हैं)