मुख्यपृष्ठग्लैमरसाक्षात्कार : ‘यह अनुभव बड़ा यादगार रहा!’-सनी देओल

साक्षात्कार : ‘यह अनुभव बड़ा यादगार रहा!’-सनी देओल

 

फिल्म ‘बेताब’ से बॉलीवुड में डेब्यू करनेवाले सनी देओल के करियर में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन हर मुश्किल का सामना करते हुए वे सफलता की ओर हमेशा अग्रसर रहे। फिल्म ‘गदर-२’ की सफलता के बाद सनी की फिल्म ‘जाट’ जल्द ही रिलीज होनेवाली है, जिसमें सनी के अपोजिट संयमी खेर और निगेटिव किरदार में रणदीप हुड्डा नजर आएंगे। अब इसे संयोग कहें या कुछ सनी की फिल्म ‘भैय्या जी सुपरहिट’ री-रिलीज हो रही है। पेश है, सनी देओल से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

जाट होने के नाते आप फिल्म ‘जाट’ से खुद को कैसे रिलेट करते हैं?
अपने देश में ‘जाट’ यानी ‘जट’ किसान को कहा जाता है। इस फिल्म में मैं जाट यानी किसान बना हूं। किसान कहीं का भी क्यों न हो उसका खान-पान, रहन-सहन, संस्कृति और जीवन तकरीबन एक सा होता है। फिल्म की कहानी जब लेखक-निर्देशक गोपीनाथ मल्लिनेनी ने मुझे सुनाई तो मैं दंग रह गया क्योंकि मैं खुद जाट परिवार से हूं।

 साउथ के मेकर के साथ पहली बार काम करने का अनुभव कैसा रहा?
अब क्या-क्या बताऊं? साउथ में आम लोगों के लिए फिल्में बनाई जाती हैं और मनोरंजन के साथ ही अच्छी कहानी का खासा ध्यान रखा जाता है। साउथ की फिल्मों में निर्देशक को सुना जाता है, उसकी काबिलियत पर भरोसा किया जाता है। मैंने जब गोपीनाथ से कहानी सुनी तो इस प्रोजेक्ट को खुशी से स्वीकार कर लिया। हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी एक वक्त ऐसा था जब निर्देशक सर्वोपरि था, लेकिन अब गड़बड़ हो रही है।

क्या ‘आश्रम’ वेब सीरीज के बाद बॉबी ने आपको मश्विरा दिया था कि आप इस वेबसीरीज को न देखें?
हमारे परिवार में बॉबी सबसे छोटा है और मेरे लिए वो बेटे के बराबर है। ‘आश्रम’ की रिलीज के बाद बॉबी ने मम्मी के साथ मुझे कहा था, ‘भैया तुसी इसे ना वेखो तो चंगा होगा!’ मम्मी भी ‘आश्रम’ देखना चाहती थी पर बॉबी ने उन्हें भी न देखने के लिए आगाह किया। इसकी एक ही वजह थी कि इस शो में काफी वायलेंस है। मैं बॉबी को लहूलुहान होते देख नहीं सकता। बस, इसी कारणवश मैं ‘आश्रम’ से दूर ही रहा।

 आपने जाहिर किया था कि आप साउथ में सेटल होना चाहते हैं?
साउथ का अनुशासन भरा वर्विंâग स्टाइल देखकर मैं दंग रह गया। ‘जाट’ मेरी साउथ की पहली फिल्म है और यह अनुभव बड़ा यादगार रहा। मैंने महसूस किया ये लोग अपने काम को बड़ी गंभीरता से लेते हैं और फिल्मों को ओवर बजट नहीं होने देते। इसलिए मैंने मजाकिया अंदाज में कहा था कि मैं अब प्रोफेशनल कारणों की वजह से साउथ में बसनेवाला हूं, नथिंग सीरियस!

 चंद फिल्मों के निर्देशन के बाद आपने बतौर निर्देशक नई फिल्में क्यों नहीं साइन की?
वर्ष १९९९ में ‘दिल्लगी’ फिर २०१६ में ‘घायल वन्स अगेन’ फिर २०१९ में ‘पल पल दिल के पास’ फिल्मों को मैंने निर्देशित किया था। जब भी मैंने फिल्म निर्देशित की तब एक्टिंग को मुझे बैक सीट पर रखना पड़ा। हितैषियों ने मुझे सलाह दी कि आपके दर्शक आपको बतौर एक्टर सिल्वर स्क्रीन पर देखना चाहते हैं। जब भी मैंने निर्देशन की बागडोर संभाली मुझे उन फिल्मों को मना करना पड़ा, जिनका मुझे ऑफर मिला था। एक लीडिंग एक्टर के रूप में मेरा करियर जब अच्छा-खासा चल रहा है, तो मुझे उसी पर फोकस करना चाहिए न! इसलिए निर्देशन की बजाय अब मैंने एक्टिंग को तवज्जो दी है।

 आप राजनीति में सक्रिय नहीं हैं क्यों?
वोट के जरिए जनता ने मुझे चुना था, लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हुआ कि राजनीति से मैं समाज सेवा नहीं कर सकता। पॉलिटिक्स एक करियर है, जिसे मैं नहीं कर सकता। अगर समाजसेवा करनी ही है तो फिल्मों के जरिये मैं लोगों का मनोरंजन कर रहा हूं और यह भी समाजसेवा का ही एक माध्यम है। राजनीति मेरी दुनिया नहीं है, इसे जानते ही मैंने इससे दूर होना ही बेहतर समझा।

 क्या आप कभी डिप्रेशन से गुजरे हैं?
करियर में उतार-चढ़ाव और उम्मीदें पूरी न होने पर कलाकारों को डिप्रेशन से गुजरना पड़ता है। अब निराशा इस दौर में जीने का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन रब ने मुझे निराशा से निपटने की शक्ति दी है। विपरीत परिस्थितियों में भी मैं हार नहीं मानता। असफलता को हावी नहीं होने देता। मेरा सोचना है कि दर्द को लेकर मत बैठो और खुद को कामकाज में व्यस्त रखो। मैं सकारात्मकता का दामन नहीं छोड़ता।

 आपके पिता धर्मेंद्र अपने फार्म हाउस में रहते हैं, जबकि परिवार यहां मुंबई में है?
कोविड के दौरान पापा के लिए यहां रहना सेफ नहीं था इसलिए वो लोनावला के फार्म हाउस चले गए। उन दो सालों में उन्होंने खेती की और खेत में काम करनेवाले किसानों से दोस्ती की। पापा अक्सर मुंबई आते हैं और हम सभी के साथ वक्त बिताते है। पापा उन सभी किसानों के हमदर्द बने हैं और पापा के बिना उन किसानों को चैन नहीं मिलता।

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