योगेश कुमार सोनी
वरिष्ठ पत्रकार
कल यानी 6 अप्रैल को रामनवमी है। धार्मिक मान्यता है कि चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। इसलिए हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को रामनवमी का पर्व मनाया जाता है। इस त्योहार के आने का देश ही नहीं, बल्कि दुनिया में रह रहे रामभक्तों को बेसब्री से इंतजार रहता है। जगत के पालनहार भगवान विष्णु के सातवें अवतार प्रभु श्रीराम हैं, लेकिन आजकल लोग राम के नाम को अपने वर्चस्व व राजनीति के लिए प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि राम का आचरण, शैली, त्याग व तपस्या का प्रतीक है, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से प्रेरित होकर जीवन जीते हैं। राम के चरित्र से सत्य, दया, करुणा, धर्म और मर्यादा के मार्ग पर चलने की राह मिलती है। विषम परिस्थितियों में भी किस तरह मानव को अपने जीवन को संचालित करना चाहिए यह समझने के लिए राम का चरित्र एक संपूर्ण कोर्स है। लेकिन हम नई पीढ़ी को इस तरह की चीजों को समझाने में असफल सा महसूस कर रहे हैं। आजकल की युवा पीढी में क्रोध और कुछ भी न सहने की क्षमता से कमजोर पड़ता देख मन में एक अजीब सी चिंता बनी रहती है। खुलेपन के नाम पर नग्नता और बेशर्मी ने आज युवाओं को जिस राह पर खडा़ कर दिया, इससे उनके भविष्य के साथ देश का भविष्य भी खतरे में लगता है। राम और सीता के वनवास को लोग सिर्फ सुनते हैं, लेकिन उसके पीछे का मर्म व दर्द की कल्पना भी नहीं करना चाहते। आजकल के कुंवारे युवाओं को तो छोड़िए शादीशुदा दंपत्ति एक-दूसरे को दगा देने में लगे हुए हैं। बीते दिनों मेरठ में एक महिला ने अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ मिलकर अपनी पति की बेरहमी से हत्या कर दी। इस घटना के बाद ऐसी खबरों का आना लगातार जारी है, लेकिन सवाल यही है कि क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को अपने भगवान, देवी-देवताओं व संतों के संदेश को देने व बताने के लिए इतने असफल हो चुके हैं कि वह अपने जीवन को संभाल तक नहीं पा रहे। धर्म व अध्यात्म को लेकर जितना प्रचार-प्रसार हो रहा है, क्या उसका एक प्रतिशत भी लोग अपने जीवन में उतार पा रहे हैं।शायद नहीं और जिसका परिणाम यह हो रहा है कि हम ऐसे अंधकार की ओर बढ़ रहे हैं, जहां केवल रुसवाई है। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि बच्चों को धर्म की ओर जोड़ें और उसका पालन करना भी सिखाएं, चूंकि आजकल के हाईटेक दौर में मस्तिष्क में ठहरावट नाम की चीज खत्म होती जा रही है, जिससे लोगों में सहने की क्षमता कम हो गई और युवा आक्रोश में आकर गलत निर्णय ले लेते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में सबसे ज्यादा डिप्रेशन के मरीज बढ़े हैं, जिसका कारण यहां अव्यवस्था बताई जा रही है। अव्यवस्था से अभिप्राय यह है कि युवा तरक्की की दौड में भागते हैं और धर्म, ज्ञान व संस्कार अर्जित करने के लिए के उनके पास समय नहीं होता और यदि वह विफल हो जाते हैं तो वह डिप्रेशन में चले जाते हैं और इस वजह से किसी भी घटना व रिश्तों को समझ नहीं पाते। भारत में डिप्रेशन के मरीजों की संख्या कई कारणों से जैसे तेज भागदौड़ भरी जिंदगी, मानसिक तनाव, काम का दबाव, सामाजिक और आर्थिक बदलाव, अकेलापन और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी आने की वजह भी है। लेंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 19.73 करोड़ लोग विभिन्न तरह की मानसिक समस्याओं से ग्रस्त हैं। इनमें 5 करोड़ लोग डिप्रेशन और 6 करोड़ लोग तनाव से ग्रसित हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि स्ट्रेस या तनाव का दायरा इस आंकड़े से कहीं ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक, तनाव और डिप्रेशन से परेशान रहने वाले ज्यादातर लोग वे शहरी युवा होते हैं, जो कॉरपोरेट जगत में काम करते हैं। इस कारण 1990 के बाद भारत में सभी तरह के मानसिक बीमारियों से पीड़ित मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है। चिंता की बात यह है कि अधिकांश लोग तनाव और अवसाद को गंभीरता से नहीं लेते। उन्हें लगता ही नहीं कि यह कोई बीमारी है। एक्सपर्ट का कहना है कि जिस तरह शरीर की बीमारियां होती हैं, उसी तरह मन की भी बीमारियां होती हैं। मन की बीमारियां जीवन की गुणवत्ता को बहुत खराब कर देती है। यदि महानगरों के संदर्भ में एक घटना समझें तो बहुत कुछ समझ में आ जाएगा। यदि दो वाहनों की आपस में छोटी सी टक्कर भी हो जाती है तो वह एक-दूसरे पर इस तरह से लड़ते हैं, मानो उन्होंने आपस में जायदाद छीन ली हो। पार्किंग विवाद में मर्डर तक कर देते हैं। ऐसी घटनाओं से यह तो तय हो जाता है कि मानव जीवन पर संकट का स्तर बहुत बडा़ होता जा रहा है। आज धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए देशभर में रामकथाएं हो रही हैं, जिसमें लाखों लोग आते हैं। वह कथा के सार को समझने का अनुसरण भी करते हैं, लेकिन बस उसका पालन नहीं कर पाते। लेकिन हमें आने वाली पीढ़ी को सुधारने के लिए फिर से एक बड़ा बदलाव करना पडेगा।