मुख्यपृष्ठस्तंभऋतुचक्र : चइता  : कब अइहैं आंखे कइ पुतरिया हो रामा

ऋतुचक्र : चइता  : कब अइहैं आंखे कइ पुतरिया हो रामा

सुरेश मिश्र

आखिर विरहिणी की विरह वेदना अपने चरम पर पहुंच गई। सिसकियां भरते-भरते पूरा फागुन महीना बीत गया। उधर होली जल रही थी, इधर विरहिन के अरमान धूं-धूं कर जल रहे थे। उधर पिचकारी बरस रही थी तो इधर नायिका के नैन बरस रहे थे। मलमल की सेज कांटे की लग रही थी। सारी मनौतियां फेल हो गईं। सिसकते-बिलखते फागुन बीत गया। लाचार नायिका खुद से पूछती है-

कब अइहैं आंखे कइ पुतरिया
हो रामा
बितल फगुनवां।
रहिया लखत बीतल बारह महिनवां
होलिया के जइसे जरे हमरा परनवां
समुझइं न हमरे संवरिया हो रामा
बितल फगुनवां।
कब अइहैं आंखे कइ…
मघा जइसन अंखियां से बरसेला पनियां
केकरा बताई अपने जिया कइ कहनियां
नागिन जइसे डंसेला सेजरिया हो रामा
बितल फगुनवां
कब अइहैं आंखे…
दिनवां पहाड़ लागे, युग जइसन रतिया
मुवां चिट्ठी रसवा लइ आवइ नाहीं पतिया
जिया करइ देई सउ-सउ गरिया हो रामा
बितल फगुनवां
कब अइहैं आंखे…
कंगना चिढ़ावइ मोहें, छेड़ेला नथनियां
झुलनी के संग तंग करे माथबेनियां
हम रोई दिन दुपहरिया हो रामा
बितल फगुनवां
कब अइहैं आंखे…
छुवे ना गुललवा, न खेले हम रंगनवां
काटि-काटि खाइ दउड़इ हमके अंगनवां
सूनी-सूनी लागेला बखरिया हो रामा
बितल फगुनवां
कब अइहैं आंखे…
देवरा निगोड़ा हमपे डारे जब रंगनवां
हमरा करेजा फाटइ लागे जइसे बनवां
पिचकारी लागे चिनगरिया हो रामा
बितल फगुनवां
कब अइहैं आंखे…
कमवां न होए हमसी कमवा सतावेला
पिया निरमोही काहें घरवा न आवेला
बीति जाए अइसइ उमिरिया हो रामा
बितल फगुनवां
कब अइहैं आंखे…
हमरा क देखि-देखि चनवां जरत बा
पिया परदेशवा में जाने का करत बा
कब ले जोहइब्या डगरिया हो रामा
बितल फगुनवां

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