विमल मिश्र
आज जिस मुंबई शहर का चेहरा हम देखते हैं, उसके पीछे सबसे बड़ा हाथ यहां के पारसी दानवीरों का है। सेहत, शिक्षा और जन कल्याण के कई कार्यक्रमों के लिए मुंबई उनकी ऋणी है। इन्हीं में नाम है सर फरामजी कावसजी बानाजी और लोवजी नसरवानजी वाडिया व उनके भाई सोराबजी वाडिया का।
मुंबईवासियों के लिए अपनी थैलियों का मुंह खोलने में हिंदू धन्नासेठों के साथ पारसी धनपतियों या मुस्लिम रईस-सब में जैसे होड़ लगी रही। शहर की चौड़ी सड़कें, भव्य इमारतें और खुली सार्वजनिक जगहें, इन्हीं भामाशाहों की देन हैं। एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, दानवीरों की सूची में मुंबई देश में अव्वल है। ५० दानवीरों में से १५ मुंबई से ही संबंध रखते हैं। आज जिस शहर का चेहरा हम देखते हैं उसके पीछे सबसे बड़ा हाथ इन्हीं का है। सेहत, शिक्षा और जन कल्याण के कई कार्यक्रमों के लिए भी मुंबई उनकी ऋणी है।
सर फरामजी कावसजी बानाजी
बहुमंजिली इमारतों से पटा आज का पवई उन दिनों सुशांत ग्राम्य अंचल होता था। झील का विशाल विस्तार, चारों तरफ खेत और जगह-जगह विचरते वन्य पशु, सब सर फरामजी कावसजी बानाजी की मिल्कियत। पवई झील किनारे फरामजी का जीर्ण-शीर्ण बंगला उन दिनों की याद आज भी दिलाता है।
रेलवे, हाउसिंग, चीनी मिल, निवेश, नील, रेशम के कारोबार किस चीज से नहीं जुड़े थे फरामजी कावसजी बानाजी। बीमा से उन्होंने ही शहरवासियों को परिचित कराया। ‘पहले-पहल’ सरीखी उपलब्धियों की तो उनके नाम पर बहार है। मसलन, जीआईपी रेलवे (आज की मध्य रेल की पूर्वज) का पहला भारतीय शेयर खरीदार बनना, इंग्लैड की महारानी विक्टोरिया को मुंबई का आम भेजने वाला पहला भारतीय होना और मुंबई का पहला ‘जस्टिस ऑफ पीस’ बनना। मुंबई में गैस लाइटिंग लानेवाले और पाइपों के जरिए पानी एक जगह से दूसरी जगह ले जानेवाले भी पहले लोगों में से वे हैं।
फरामजी बानाजी पहले भारतीय हैं, जिन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए मुंबई के संभ्रांतजनों की सर्वधर्मीय सार्वजनिक सभा टाउन हॉल में हुई, पर फरामजी को मुंबई वाले सबसे अधिक याद करेंगे उनके नेक कामों के लिए। मसलन, गरीब लोगों की प्यास बुझाने के लिए जगह-जगह कुएं खुदवाना और शिक्षा, खासकर वैज्ञानिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए। पारसी समाज के लोगों के लिए टावर ऑफ साइलेंस पर एक दोखमा उनका बनाया हुआ है।
आज का विक्रोली स्टेशन फरामजी की ही देन है। धोबी तालाब पर एक प्याऊ ने आज भी उनका नाम जिंदा रखा हुआ है।
लोवजी नसरवानजी और सोराबजी वाडिया
मुंबई में देश का पहला ड्राई डॉक है, जिसका निर्माण १७३५ में सूरत से मुंबई आकर बस गए पारसी लोवजी नसरवानजी वाडिया और उनके भाई सोराबजी ने १७५० में कराया। उनके छोड़े हुए कामों को उनके बेटों मानेकजी और बोरामजी ने और आगे बढ़ाया।
शिपिंग इंडस्ट्री का अग्रज कहलाने वाले वाडिया मास्टर शिप बिल्डर्स द्वारा इंग्लैंड, पुर्तगाल व यूरोप की अन्य औपनिवेशिक शक्तियों, मराठों और नेवी के लिए मजबूत टीकवुड से बनाए गए जंगी जहाजों की धाक सातों समंदरों में थी। १७३६ निर्मित ‘ड्रेक’ ऐसा पहला पोत था। १८३५ से १८६३ के बीच वाडिया ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए १७० व ब्रिटेन की रॉयल नेवी के लिए ३४ युद्धपोत और निजी फर्मों के लिए ८७ व मस्कट की रानी के लिए तीन कारोबारी पोत बनाए। ब्रिटेन का ट्रेनिंग शिप-फौड्रोयांट (पूर्व नाम एचएमएस त्रिंकोमाली)- जिसे विश्व का अभी तक कार्यरत सबसे पुराना शिप होने का गौरव हासिल है-१८१७ में इसी शिपयार्ड में बना है।
बॉम्बे शिपयार्ड के नाम ही दूसरा विश्व कीर्तिमान भी है- ट्वीड (पंजाब) नामक इसके शिप की ८३ दिनों के भीतर लंदन से मेलबोर्न की यात्रा। १८७० में बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट बनने के दो साल बाद यहां बने ५० तोपों से सज्ज जंगी जहाज ‘कार्नवालिस’ की सफलता ने तो शिपयॉर्ड के लिए रॉयल नेवी के ऑर्डरों की बहार लगा दी। यहीं बने ‘मिंडेन’ नामक एक पोत पर अमेरिकी राष्ट्रगान की रचना हुई है। रचनाकार हैं प्रâांसिस स्कॉट की।
अन्य समाजसेवी
खरशेदजी नसरवानजी कामा, एन.एम. वाडिया, जहांगीर कामा और गोदरेज जैसे पारसियों ने शिक्षा, खासकर महिला शिक्षा के लिए जो योगदान किया, वह स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने लायक है। फोर्ट में बाजार गेट रोड और पेरिन नरीमन स्ट्रीट के जंक्शन पर खूबसूरत बोमनजी होरमुसजी वाडिया फाउंटेन और क्लॉक टॉवर पारसी समुदाय के अग्रणी, जाने-माने समाजसेवी और शहर के शेरिफ रह चुके बोमनजी होरमुसजी वाडिया की स्मृति में बना है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)