मुख्यपृष्ठस्तंभझांकी : पूर्वोत्तर में भी बढ़ी कांग्रेस

झांकी : पूर्वोत्तर में भी बढ़ी कांग्रेस

अजय भट्टाचार्य

देश के बाकी हिस्सों की तरह कांग्रेस ने आठ पूर्वोत्तर राज्यों के लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया, जहां अब भाजपा और उसके सहयोगियों का दबदबा है। कांग्रेस ने मणिपुर में दो सीटें, नागालैंड और मेघालय में एक-एक सीट भाजपा एवं उसके सहयोगियों से छीनी। इसके अलावा असम में तीन सीटें जीतीं। २०१९ के लोकसभा चुनावों की तरह भाजपा ने असम में नौ सीटें जीतीं और त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में दो-दो सीटें बरकरार रखीं। वर्तमान में भाजपा मणिपुर के साथ-साथ इन तीनों राज्यों में सरकारों का नेतृत्व कर रही है। भाजपा की सहयोगी नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) ने मेघालय में दोनों सीटें कांग्रेस और वॉयस ऑफ द पीपल पार्टी के हाथों खो दीं, जबकि एक अन्य सहयोगी नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) ने नागालैंड की एकमात्र सीट कांग्रेस के हाथों खो दी। असम में भाजपा के सहयोगी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) और असम गण परिषद (एजीपी) व सिक्किम में सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (एसकेएम) ने एक-एक सीट हासिल की। २०१९ में आठ पूर्वोत्तर राज्यों की २५ लोकसभा सीटों में से १४ पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस को चार (असम में तीन और मेघालय में एक) सीटें मिली थीं। शेष सात सीटें राज्य स्तरीय पार्टियों और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने जीती थीं। असम में एआईयूडीएफ, नागालैंड में एनडीपीपी, मिजोरम में एमएनएफ, मेघालय में एनपीपी, मणिपुर में नागा पीपुल्स प्रâंट, सिक्किम में एसकेएम और असम में एक निर्दलीय नबा कुमार सरानिया ने २०१९ में एक-एक सीट जीती थी। खास बात यह है कि राजग के घटक एमएनएफ, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, मिजोरम के मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) के अध्यक्ष लालदुहोमा के नेतृत्व वाले पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए) ने पहले ही घोषणा कर दी है कि उनकी पार्टी भाजपा के नेतृत्व वाले राजग और कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया ब्लॉक से समान दूरी बनाए रखेगी।
पितामह की सलाह
छोटे पर्दे पर भीष्म पितामह और शक्तिमान की भूमिका निभाने वाले मुकेश खन्ना ने अयोध्या में भाजपा की हार पर चुटकी ली है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा, ‘अयोध्या चुनाव हार से ये सीख लेनी चाहिए कि भव्य मंदिर के साथ-साथ आस-पास के नगरवासियों की जिंदगी को भी भव्य बनाने का प्रयास होना चाहिए। करोड़ों के बजट के बीच कुछ करोड़ वहां के लोगों की समस्या हल करने के लिए भी रखना जरूरी है। फिर चाहे ये राम मंदिर हो, चारों धाम हों या जयपुर निकट खाटू श्याम का मंदिर हो। श्रद्धा स्थल को पर्यटन स्थल (टूरिस्ट स्पॉट) न बनने दें। वहां लोग भी रहते हैं, उनका भी ख्याल रखें।’ कल किया गया उनका ये ट्वीट खूब तेजी से वायरल हो रहा है। मुकेश खन्ना ने अपने इस बयान में भाजपा का नाम नहीं लिया, लेकिन ये देखकर एकदम साफ हो गया कि यहां वो किसकी बात कर रहे हैं। अब ऐसा लग रहा है कि जैसे पितामह भाजपा पर कटाक्ष कर उन्हें बता रहे हों कि अगर करोड़ों रुपए यूं ही मंदिर को भव्य बनाने की जगह लोगों की मदद करते तो आज शायद उन्हें इस तरह से हार नहीं देखनी पड़ती। अब लोग खन्ना के इस ट्वीट पर अपनी राय रख रहे हैं और मुकेश खन्ना उस पर भी तर्क-वितर्क कर रहे हैं। एक्स पर बतकुच्चन जारी है।
तब और अब
उन्होंने पहली बार १९५२ में भारत के पहले आम चुनाव में २३ वर्षीय युवा मतदाता के रूप में मतदान किया था। रुस्तमजी के मेहता, जो अब भारत के ९५ वर्षीय वयोवृद्ध नागरिक हैं, एक बार फिर एक महीने पहले गुजरात में अपनी उंगली पर स्याही लगवाई। गुजरात में २६ अप्रैल और ७ मई को मतदान हुआ था। बकौल रुस्तमजी वे १९५२ से मतदान कर रहे हैं और तब से अब तक हुए किसी भी चुनाव में उन्होंने मतदान करना नहीं छोड़ा। वे अपने घर से मतदान करने वाले पहले मतदाता थे और इस चुनाव में भी उन्होंने यही किया। मेहता मतदान को एक बहुमूल्य अधिकार बताते हैं और कहते हैं कि लोकतंत्र में सभी को सही उम्मीदवार को सत्ता में लाने के लिए मतदान करना चाहिए। उन्हें याद है कि पहले कुछ चुनाव बहुत कम आक्रामक थे, जिनमें लोकतंत्र, गरीबी, स्वतंत्रता और उद्योगों पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनके स्तंभ प्रकाशित होते हैं।)

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