कविता श्रीवास्तव
विकसित भारत का सपना लेकर देश में हर तरफ प्रचार जोरों पर है। इस लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास भी खूब हो रहे हैं। विकसित देशों की कतार में भारत को खड़ा करने के लिए यह आवश्यक है। इस सपने को लेकर देश का नागरिक बहुत ही आशान्वित और उत्साहित है, लेकिन विकसित भारत की राह में आनेवाले रोड़ों को हटाने के लिए सबसे पहले उनकी पहचान जरूरी है। शायद हमारे नीतिकार इस दिशा में ध्यान नहीं दे रहे हैं इसीलिए देश के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में उन बाधाओं को रेखांकित करने का प्रयत्न किया है। बीते बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और बुनियादी ढांचों में सुधार के लिए अपने बजटीय आवंटन का कम से कम २५ प्रतिशत हिस्सा निर्धारित नहीं होगा, तब तक भारत के लिए विकसित देशों में शुमार होना मुश्किल होगा। सुप्रीम कोर्ट अनेक संबंधित मामलों को सुनते-सुनते इस बात का अभ्यस्त हो गया है कि दरअसल हमारी व्यवस्थाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता व बुनियादी ढांचे के लिए पर्याप्त निधि का रोना ही रोती हैं। जब भी स्कूल खोलने, शिक्षकों को वेतन देने और स्वास्थ्य, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे के लिए धन आवंटित करने के बारे में सवाल उठाए जाते हैं, तो राज्य एक मानक निधि की बाधा बता देते हैं। सवाल यही उठता है कि इन आवश्यक विषयों पर सरकारी बजट कम क्यों रखा जाता है? गौरतलब है कि देश में निजी शैक्षणिक संस्थाओं और निजी अस्पतालों की कोई कमी नहीं है। वहां भारी-भरकम फीस वसूलने का चलन है। तभी तो समय आ गया है कि उच्चतम न्यायालय इस बारे में हस्तक्षेप करे और बजट का एक चौथाई हिस्सा इन कामों के लिए आवंटित करने का दबाव डाले। हालांकि, न्यायपालिका की अपनी सीमाएं हैं और वह सरकारों को उनके खर्च कहां किए जाएं ऐसा निर्देश नहीं दे सकती है। ये सभी विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। हमारे लोकतंत्र में संघीय शासन की संरचना है। केंद्र सरकार के साथ-साथ विभिन्न राज्यों की अपनी सरकारें भी हैं। देश में यदि लोग आज भी भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो यह गंभीर समस्या है। हम मुफ्त राशन बांटने, खातों में पैसे डालने, बेरोजगारी बनाए रखने, महंगाई को रोकने में नाकाम होने आदि के चलते विकसित भारत की ओर वैâसे बढ़ सकते हैं? देश का आम आदमी यानी मध्यवर्गीय, निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब आदमी जीवनभर अपने बच्चों को पढ़ने-लिखने और परिवार के स्वास्थ्य पर खर्च करते-करते थक जाता है। उसकी आमदनी का अधिकांश हिस्सा इन्हीं दो कामों में सबसे ज्यादा खर्च होता है। परिवार को पालने-पोसने और आजीविका को चलाने की जद्दोजहद उसके जीवन से कभी खत्म नहीं होती है। विकसित भारत की दौड़ में शामिल होने के लिए वह भी अपना भरपूर श्रम-परिश्रम लगा रहा है, लेकिन विकसित देश के संपन्न नागरिक का जीवन उसके लिए अभी भी सपना ही है।