मुख्यपृष्ठस्तंभवामपंथियों की ऐतिहासिक साजिश ने क्रूर औरंगजेब को बनाया उदार

वामपंथियों की ऐतिहासिक साजिश ने क्रूर औरंगजेब को बनाया उदार

प्रो. शांतिश्री धुलीपुड़ी पंडित, कुलपति, जेएनयू

हाल ही में प्रदर्शित फिल्म “छावा” की अपार सफलता एक महत्वपूर्ण बिंदु साबित हुई है। इसने युवाओं में पाठ्यपुस्तकों ऐतिहासिकता पर आंख बंद करके भरोसा करने छोड़ने पर विवश कर दिया है।
शिवपुत्र छत्रपति संभाजी महाराज स्वराज्य हेतु संघर्ष और सर्वश्रेष्ठ बलिदान के मूर्त रूप हैं। वे सिर्फ एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल शासक, उत्तम नेतृत्वकर्ता भी थे, जिनकी विरासत सैकड़ों वर्षों से सभी को प्रेरणा देती रही है। उन्होंने स्वराज्य और बलिदान की अद्भुत परंपरा की नींव रखा था। उनका जीवन साहस, बलिदान और असाधारण वीरता की छाप न सिर्फ राजकीय और सैन्य गुणों में मिलती है, बल्कि उनका सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन भी श्रेष्ठतम रहा है। इस असाधारण पराक्रमी जीवन के बावजूद वे इतिहास के पन्नों में उपेक्षित ही रहे हैं।
इतिहास के सबसे खूनी कालखंड को वामपंथी और इस्लामिक इतिहासकारों ने सदैव छिपाया। इस्लामी शासन के इस रक्तपात के सच के सामने आने से होने वाले परिणाम के नाम पर इतिहास में अवांछित तोड़-फोड़ की गई। इन्होंने इतिहास की व्याख्या तथ्यों पर आधारित न करके, काल्पनिक आधार अपनाया हैं, तभी देश के बढ़ते बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में शंभाजी का इतिहास सिर्फ एक संक्षिप्त नाम भर रह गया है। उनकी वीरता, पराक्रम, युद्ध और नेतृत्व कौशल को मराठा साम्राज्य पर आधारित परीक्षाओं में एक बहुविकल्पीय या लघुउत्तरीय प्रश्न तक सीमित कर दिया है। यह भद्दा उपहास गलती से नहीं किया गया है, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके उत्तराधिकारियों की विरासत को इतिहास के पन्नों से मिटाने की सोची-समझी साजिश है। इस संदर्भ में हमें उनके योगदान और कथानकों की सोची समझी उस उपेक्षा का मूल्यांकन करना ही होगा, जिसने उनके योगदान को छुपाया है। इस प्रकार के मनगढ़ंत इतिहास से न सिर्फ भ्रम बढ़ता है, बल्कि यह दर्दनाक भी है।
क्रूरता, दमन और निरंकुशता से भरे औरंगजेब को उदार, सहिष्णु और समावेशी सिद्ध करने की एतिहासिक साजिश वामपंथी और इस्लामी धारा के कथित विद्वानों ने की है। इसी का प्रचार प्रसार जोरों पर है। जिस औरंगजेब ने स्वयं को कभी धर्मनिरपेक्ष नहीं माना, उसे ही इन लोगों ने बहुलवादी बता कर उल्टी धारा बहाने का काम किया है। उसके स्वयं के दरबार के दस्तावेज जैसे कि “फतावा-ए-आलमगीरी” (फतवों की एक पुस्तक) या “मआसिर-ए-आलमगिरी” (आलमगीर के शासनकाल का इतिहास) उसकी कट्टरता का सबूत है। इन दस्तावेजों में अनुसार, औरंगजेब एक कठोर और तलवार के दम पर शासन करने वाला निर्दई शासक बताया गया है, जिसके पास दया क्षमा का कोई स्थान नहीं था। फिर भी कथित बुद्धिजीवी वर्ग उसे उदारता की प्रतिमूर्ति बताते हैं, किंतु शंभाजी महाराज के मानवीय आदर्शों की घोर उपेक्षा करते हैं।
शंभाजी का शासन न्याय और समानता के प्रति समर्पित था। उन्होंने जाति आधारित भेदभाव का विरोध किया और अपने शासन में जाती, भाषा और लैंगिक भेदभाव से उठकर गुणों को प्राथमिकता दी। उनके नेतृत्व में धार्मिक कट्टरता के स्थान पर राष्ट्रवादी दृष्टि मिलती है, जिसकी जड़ें समान लक्ष्य वाली भारतीय चेतना में थीं। एक महान सेनापति होने के साथ साथ, वे एक सुधारक, प्रशासक और ऐसे राजनेता के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने आत्मनिर्भर और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की। हिंदवी स्वराज्य का उनका लक्ष्य किसी को बहिष्कृत न करते हुए, सभी के उत्थान में निहित था। जो कि औरंगजेब के उस साम्राज्यवादी क्षेत्र विस्तार से बिल्कुल अलग था, जिसमें धार्मिक क्रूरता और पूर्ण दासत्व निहित था।
इस्लामिक विस्तारवाद के समक्ष घुटने न टेकना ही संभाजी का अपराध माना जाता है। उन्होंने जो संधियां की वह धार्मिक श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि मुगलिया दमन के विरुद्ध एक राष्ट्रवादी मोर्चे के निर्माण किया। मजबूत इच्छाशक्ति से उन्होंने सामाजिक कुरीतियों से लड़ने के साथ ही 127 युद्ध किए, जिसमें उनका रणनीतिक कौशल दिखता है। संगमेश्वर की बैठक में उनके स्वयं के साले गणोंजी शिर्के द्वारा किया गया विश्वासघात इतिहास का सबसे दुखद अध्याय है। यह सिर्फ एक योद्धा से विश्वासघात नहीं था, बल्कि उस आंदोलन से था जो भारत के विदेशी आक्रांताओं से लड़ रहा था।
औरंगजेब की कैद में भी शंभाजी महाराज झुके नहीं। औरंगजेब ने उन्हें मुक्ति के बदले मुसलमान बनने का दबाव दिया, लेकिन हिंदुत्व के इस सिंह ने उसे घास नहीं डाली। शंभाजी के लिए जीवन के आदर्श, जीने से बढ़कर थे। उन्होंने आत्मसमर्पण, दयायाचना और आदर्शों से समझौता करने से सिरे से इनकार कर दिया, जिसके लिए मृत्यु से पहले उन्हें अकथनीय पीड़ा, क्रूरता और दंड सहन करना पड़ा। औरंगजेब ने उनकी आंखें फोड़ीं, शरीर की त्वचा छीलकर नमक रगड़वाया, उनके हाथ पैर के घुटने तोड़े, उंगलियों से एक एक कर नाखूनों को नोंचा, उनकी आंखों को फोड़ने के लिए अफगानिस्तान से जल्लाद मंगवाए गए थे।
उनपर हुई अमानवीय क्रूरता की कल्पना भी करना रोंगटे खड़े कर देती है। उनका बलिदान औरंगजेब की क्रूरता के सामने तनकर खड़े रहने की एक अभूतपूर्व घटना है। शरीर के हर अंग तोड़ दिए जाने और असहनीय पीड़ा के बावजूद उन्होंने दया की भीख नहीं मांगी। अंतिम सांस तक वे सहयाद्रि की चट्टानों जैसे अडिग रहे। एक बहादुर योद्धा की तरह सिर्फ दैवीय शक्ति “जगदम्बा, जगदंबा” का मंत्र जाप करते रहे। उनका बलिदान किसी विरासत का अंत नहीं, बल्कि उसकी शुरुआत है। उनके बलिदान और हार मानने की दृढ़ता ने उन्हें राजाओं से भी महान बना दिया। हमें यह भी स्मरण रहे कि औरंगजेब का अत्याचार सिर्फ शंभाजी महाराज तक ही सीमित नहीं था। उसने सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर का सर कलम करवाया, गुरु गोविंद सिंह पर अत्याचार किए, उनके दोनों साहबजादे जोरावर सिंह 9 वर्ष और फतेह सिंह 7 वर्ष को इस्लाम न मानने पर उनके सरदार वजीर खान ने दीवार में जिंदा चुनवा दिया था। अतः औरंगजेब के हर क्रूरतापूर्ण किए गए कार्य विचारपूर्वक थे। वह हिंदुओं और सिखों के मन में डर भरना चाहता था। फिर भी वामपंथी और मुस्लिम इतिहासकर उनकी इस क्रूरता और अमानवीयता पर न चुप्पी साधे रहे हैं, बल्कि उन्होंने उसके काले कारनामों को सफेदपोश बना कर समावेशी और उदार बनाने का घृणित कार्य किया था। जिसका खंडन स्वयं औरंगजेब और उसके दरबारी दस्तावेज करते हैं।
शंभाजी महाराज का जीवन सिर्फ इतिहास ही नहीं, बल्कि देशप्रेम, साहस और न्यायप्रियता की अद्भुत मिसाल है। मुगलों के साथ साथ ही उन्होंने सामाजिक कुरीतियों से भी युद्ध किया जिससे एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की जा सके। सामरिक रणनीति में विशेष तौर पर नौसेना युद्ध के विकास में उनका योगदान आज भी प्रासंगिक है। न्याय और धर्म में उनका अटूट विश्वास अपने व्यक्तिगत लाभ या हानि के लिए नहीं, बल्कि जनता के आत्मसम्मान के लिए था। देव, देश और धर्म का उनका विचार भारतीय आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा था। जिससे अन्याय के विरुद्ध लड़ने की शक्ति मिलती है। यही शक्ति सैकड़ों वर्षों के आक्रमण, विश्वासघात और विद्रूपीकरण से लड़ने की प्रेरणा भी देती है।
इस संदर्भ में हाल ही में प्रदर्शित छावा बेहद महत्वपूर्ण बिंदु है। इससे युवाओं में तोड़े-मरोड़े गए गलत इतिहास के ऊपर प्रश्न उठाने की चेतना आई है। अब वे आंख बंद करके किसी भी किताब की इतिहास दृष्टि पर भरोसा नहीं करेंगे। इस फिल्म में एक ऐसे रक्तपिपासु तानाशाह का असली चेहरा बेनकाब किया है, जिसकी क्रूरता की कोई सीमा नहीं थी। साथ ही फिल्म ने शंभाजी महाराज की महान विरासत और बलिदान की यादों को पुनर्जीवित कर दिया है। शिवाजी सावंत लिखित उपन्यास छावा से प्रेरित यह फिल्म उनके बलिदान के 336 वर्ष बाद आई है।
फिर भी उनके जैसे महान बलिदानी जिन्होंने राष्ट्र का भाग्य संवारा, बहुत कम है। इस फिल्म ने वह काम किया, जो सैकड़ों इतिहास के ग्रन्थ नहीं कर सके। इसके माध्यम से छत्रपति की महानता एक बार फिर से राष्ट्रीय मानस पर छा गई है। इसने उन मिथ्या ऐतिहासिक कथानकों को नष्ट किया, जो एक साजिश के रूप में लिखा गया है। इससे भारत के नागरिकों में अपनी विरासत के प्रति आदर और सम्मान बढ़ा है। सिनेमाघरों से बाहर निकलते दर्शकों की आंखों में आंसू और दिल में आग भरी होती है, जो वे अपने सिंह शिशु या छावा के लिए रखते हैं।
शंभाजी सिर्फ इतिहास पुरुष ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की धरोहर, धड़कन और आत्मा की शक्ति हैं जिसकी सभ्यता को कभी कोई मिटा नहीं सका। एक समय उनकी सच्ची कहानी की उपेक्षा की गई, जो अब और भी मजबूत हो चुकी है, जिससे हमें प्रेरणा मिलती है कि , सच्चा साहस किसी पर अधिकार जमाना नहीं, बल्कि अत्याचारी के खिलाफ सीना तानकर खड़े रहना है। शंभाजी महाराज ने युद्ध सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि एक विचार के लिए लड़ा। और वह विचार आज भी सजीव है।

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