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सोने की ताकत: दुनिया के टॉप बैंकों से आगे भारतीयों की तिजोरी, लेकिन क्या वाकई हम इसका सही इस्तेमाल कर रहे हैं? —भरतकुमार सोलंकी, अर्थशिल्पी

हाल ही में जारी एक ग्लोबल अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय परिवारों के पास लगभग 25,000 टन सोना होने का अनुमान हैं, जो दुनिया के टॉप 10 केंद्रीय बैंकों के कुल स्वर्ण भंडार (21,000-23,000 टन) से भी अधिक हैं। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला हैं, बल्कि गर्व करने लायक भी हैं कि भारत के आम नागरिकों के पास दुनिया के सबसे बड़े बैंकों से ज्यादा संपत्ति हैं। लेकिन सवाल यह उठता हैं कि क्या यह सिर्फ एक संख्यात्मक उपलब्धि हैं, या इसका कोई वास्तविक आर्थिक योगदान भी हैं? क्या यह सोना सिर्फ तिजोरियों में बंद रहने के लिए हैं, या इसे भारत की आर्थिक प्रगति में सक्रिय रूप से इस्तेमाल किया जा सकता हैं?

भारत में सोने का सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व किसी से छिपा नहीं हैं। यह न केवल धन और समृद्धि का प्रतीक हैं, बल्कि सुरक्षा की भावना भी देता हैं।लेकिन विडंबना यह हैं कि यह संपत्ति, जो भारत को वैश्विक वित्तीय शक्ति बना सकती हैं, आज भी निष्क्रिय पूंजी बनी हुई हैं। अगर इस विशाल स्वर्ण भंडार का एक हिस्सा भी देश की आर्थिक प्रणाली में सक्रिय हो जाए, तो भारत की वित्तीय स्थिति, रोजगार के अवसर, इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास और निवेश क्षमता में जबरदस्त सुधार हो सकता हैं। आखिर हमारे पास दुनिया के सबसे धनी केंद्रीय बैंकों से ज्यादा सोना होने के बावजूद, हम इसे अपनी आर्थिक ताकत में क्यों नहीं बदल पा रहे हैं?

सरकार द्वारा कई योजनाएं लाई गईं, जैसे कि गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम (GMS), लेकिन भारतीय समाज की पारंपरिक सोच और सोने के प्रति भावनात्मक लगाव के कारण ये योजनाएं व्यापक रूप से सफल नहीं हो सकी।लोग अब भी अपने सोने को तिजोरी में रखना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं, बजाय इसे बैंक में जमा करने या सोना-समर्थित बॉन्ड में निवेश करने के। क्या यह मानसिकता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सही दिशा में हैं?यदि बैंक इस सोने का सही इस्तेमाल करे, तो इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हो सकता हैं, सोने का आयात कम हो सकता हैं और सरकार इस पूंजी का उपयोग बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में कर सकती हैं, जिससे नए बिजनेस और लाखों रोजगार उत्पन्न होंगे। लेकिन इसके लिए जरूरी हैं कि सरकार बेहतर ब्याज दर, गारंटी और सुविधाजनक प्रक्रियाएं लेकर आए, जिससे लोग भरोसे के साथ अपना सोना बैंकिंग सिस्टम में लाने के लिए प्रेरित हो।

अगर अमेरिका, जर्मनी, चीन और रूस जैसे देश अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए अपने केंद्रीय बैंकों में रखे सोने का उपयोग कर सकते हैं, तो फिर भारत के लोग अपने विशाल स्वर्ण भंडार को सिर्फ भावनात्मक संपत्ति मानकर निष्क्रिय क्यों छोड़ रहे हैं? क्या हमें इस मानसिकता से बाहर निकलकर सोने को एक इंवेस्टमेंट और ग्रोथ टूल के रूप में नहीं देखना चाहिए? क्या भारत को सोने की सुरक्षा से आगे बढ़कर सोने की उत्पादकता पर ध्यान नहीं देना चाहिए? गर्व करने के साथ यह सोचने का भी समय हैं कि क्या हम अपनी असली आर्थिक क्षमता का उपयोग कर रहे हैं या बस संख्याओं के खेल में खुश हो रहे हैं?

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