पंकज तिवारी
ददा को ना करके बुधई फंस चुका था, जबकि मुंबई जाने और फिल्मों में काम करने का उसका मन बहुत पहले से ही था। हाथ से फिसलती रेह को देख बुधई परेशान हो उठा और परेशान बुधई तारा में से ही चिल्ला उठा… ‘ददा हम इंहीं हई…, ये सभे झूठ बोलत हयेन। का भवाऽ? कहां जाइके बा?’ कहते हुए सिर पानी में डूबो कर, पनडुब्बिया तैर, तैरते हुए बुधई बड़ी तेजी के साथ ददा की तरफ बढ़ चला। सभी बच्चे गुस्से में लाल बुधई को घूरने लगे, जबकि बुधई जैसे किसी को जानता ही नहीं था। आज बहुत दिनों बाद इतने अच्छे शब्दों में और लगाव के साथ ददा कहा था बुधई ने। बुधई के इस व्यवहार से ददा एकदम भावविभोर हो उठे थे। जैसे खुशियों की पूरी थाती मिल गई हो ददा को। ‘आउ, आउ जल्दी आउ। चल तोंका फिलिम में काम देवावइ वाला केउ आइ बाऽ। भगवान तोंका बदे केहू विशेष के भेजे हयेन’, ददा के आंख से आंसू के छींटें सा कुछ बस बाहर आने ही वाला था। बुधई बाहर आते ही भीजा-भिजान कपड़े में ही दौड़कर ददा का पांव छू लिया। ददा एक बार फिर खुशी से गदगद हो उठे। बुधई का हाथ पकड़े इतनी तेजी के साथ घर की तरफ बढ़े जैसे वर्षों से गायब कुछ मिल गया हो। अगल-बगल चर रही गायें, चिड़ियों का झुंड, पानी में नहा रहे बच्चे सब की निगाह अब अचरज के साथ ददा को ही देख रही थीं। बच्चे फटाफट बाहर आकर कपड़े बदलते हुए बुधई के पीछे हो लिए। रास्ते भर ददा बुधई को समझाते ही रहे कि ‘राकेश जवनइ पूछइ ओकर उत्तर कायदे से दिहे भइया, ढेर कऽ गेगलाए जिनि।’ बुधई बस सिर हिलाए आगे बढ़ा जा रहा था। पूरे रास्ते के लोग अचंभित हो भीड़ को निहारे जा रहे थे। जोगई चचा उजरकी पगड़ी बान्हें मचिया पे बैठे सूत कात रहे थे, चश्में को ऊपर कर आंख पर जोर देते हुए भीड़ को देखने और पढ़ने में लगे तो पर आंखें असफल रहींऽ। आस-पास कोई दिखा भी नहीं कि पूछ सकें। बहोरी बहु अपने बखरी के ओसारे में खड़ी घूंघट के ओंट से ददा और बुधई को देख परेशान हो उठी कि आखिर ये भाग क्यों रहे हैं उधर झरोखों के बीच से झांकती इमरती बुआ झट से भागकर बाहर आ गईं और भीड़ के पीछे हो लीं। देखते ही देखते पूरे गांव में बात आग की तरह पैâल गई कि बुधइया मुंबई जाएगा और फिलिम में काम करेगा। इधर दादी राकेश का इतिहास-भूगोल सब खंगाल चुकी थीं। वर्षों बाद खांड़ का सिखरन दही के साथ पीने को मिला था राकेश को। राकेश मन ही मन तैयार हो चुका था कि अब बुधई को मुंबई जरूर लेकर जाउंगा, बस उसे खाना बनाना आता हो। राकेश सोच ही रहा था की दौड़ कर पांव छू लिया बुधई ने। भीड़ वहीं जामुन के पेड़ के पास ही खड़ी हो गई थी। आवाज वहां तक साफ नहीं पहुंच पा रही थी। बुआ से रहा नहीं जा रहा था कि आखिर बतकही काउ होइ रहीऽ बा।
खैर बात क्या हुई? रहस्य ही रहा। राकेश अपने घर चला गया। लोग उसे जाते हुए ऐसे देख रहे थे जैसे कोई अजूबा आ गया हो गांव में। वैसे राकेश का पहनावा किसी अजूबे से कम भी नहीं था। बाल तो जैसे अमेजन जंगल हो गए थे। राकेश मुश्किल से चार घर आगे गया होगा कि इमरती बुआ टपक पड़ीं दादी के पास जबकि दादी मचिया लिए घर में चली जा रही थीं। ‘जीजी कवनउ काम बाऽ का? अचानक से आये इस प्रश्न हेतु बुआ तैयार नहीं थीं बस हकला कर रह गईं जबकि ‘हमार तबियत ठीक नाइ बाऽ, जाथई रचि के अराम करब, तू संझा कईं आऊ जीजी’ कहकर दादी बखरी भीतर चली गईं। बुआ बस निहारती रहीं। भीड़ बुआ के साथ हुए इस व्यवहार को देखकर लोट-पोट होने लगी थी। पैर झटक कर बड़ी तेजी के साथ बुआ अपने घर चली गईं और इधर बुधई से खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी पर क्या करें बेचारे को राकेश ने मना कर रखा था कि किसी को कुछ भी न बताओ। अंदर ही अंदर फुल-फचक रहा था बुधई, जबकि ददा लगातार उसकी निगरानी कर रहे थे कि कहीं पोल न खोल दे बुधइया। जल्दी ही समय आ गया और गठरी-मुठरी बांधे बुधई मुंबई जाने को तैयार हो गया था।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)